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२०१८ की पार्टी संविधान चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में थी या नहीं? सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना की अहम दलील*

मोहम्मद मुकीम शेख 

दिल्ली / मुंबई , १५ सितंबर २०२६ शिवसेना पक्ष और पार्टी के चुनाव चिन्ह से संबंधित मामले में आज सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। शिवसेना की ओर से वरिष्ठ विधिवेत्ता नीरज किशन कौल ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने चुनाव आयोग के फैसले को केवल विधायकों की संख्या पर आधारित बताए जाने के दावे को खारिज करते हुए कहा कि आयोग ने पार्टी में फूट, संगठनात्मक स्थिति, पार्टी संविधान, आंतरिक लोकतंत्र और विधायी दल की वास्तविक स्थिति सहित कई पहलुओं पर विचार किया था।

कौल ने दलील दी कि चुनाव आयोग का फैसला केवल विधायकों की संख्या के आधार पर नहीं था, बल्कि पार्टी की संगठनात्मक स्थिति, संविधान, आंतरिक लोकतंत्र और २०२२ के राजनीतिक घटनाक्रम को भी ध्यान में रखा गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि २०१८ में बदला गया शिवसेना का पार्टी संविधान वास्तव में चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में था या नहीं। २७ फरवरी २०१८ के पत्र में संगठनात्मक चुनाव और पदाधिकारियों की जानकारी दी गई थी, लेकिन संशोधित संविधान जमा किए जाने का स्पष्ट दस्तावेजी प्रमाण नहीं है।

पार्टी के संविधान में बदलाव करना हो तो उसका प्रस्ताव पार्टी की आम सभा में रखना जरूरी होता है। वकील नीरज किशन कौल ने दलील दी कि यह संविधान तानाशाही तरीके से बनाया गया था और चुनाव आयोग इसे खारिज कर सकता था। इसी वजह से उद्धव ठाकरे ने इस बैठक और बदले हुए संविधान की जानकारी चुनाव आयोग को नहीं दी।

कौल ने १९९९ के पार्टी संविधान का हवाला देते हुए कहा कि उसमें आंतरिक लोकतंत्र और संगठनात्मक चुनावों की व्यवस्था थी, जबकि २०१८ के बदलावों से इस संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। उन्होंने यह भी कहा कि ‘पक्षप्रमुख’ पद २०१८ में पहली बार नहीं बना था, बल्कि २०१३ से इसका उल्लेख था।

शिवसेना की ओर से यह भी दलील दी गई कि २०२२ का विभाजन केवल विधायकों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका असर पार्टी संगठन और जमीनी स्तर तक दिखाई दिया। समानांतर बैठकें, अलग-अलग व्हिप और प्रस्ताव तथा दोनों गुटों का खुद को शिवसेना बताना विभाजन के महत्वपूर्ण संकेत हैं।


कौल ने चुनाव चिन्ह आदेश के पैरा १५ और संविधान के अनुच्छेद ३२४ का हवाला देते हुए कहा कि दो गुटों के बीच वास्तविक पार्टी प्रतिनिधित्व तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है। साथ ही, जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा २९A(९) के तहत पार्टी संविधान में किए गए महत्वपूर्ण बदलावों की जानकारी चुनाव आयोग को देना आवश्यक है।

शिवसेना की ओर से रखी गई दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई १६  सितंबर को तय की।

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