नई दिल्ली/मुंबई, 2 सितंबर 2026: शिवसेना के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक अधिकारों को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और संविधान में हुए बदलावों को लेकर महत्वपूर्ण दलीलें सामने आईं। शिवसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने अदालत के समक्ष पार्टी के 1990 के दशक से लेकर 2018 तक के संगठनात्मक ढांचे में हुए बदलावों का उल्लेख किया।
कौल ने दलील दी कि शिवसेना ने चुनाव आयोग की आपत्तियों के बाद 1997-99 के दौरान संगठनात्मक चुनाव और निर्वाचित पदाधिकारियों की व्यवस्था को स्वीकार किया था। उनके अनुसार, 2018 में पार्टी के संविधान में किए गए बदलावों के बाद संगठन की महत्वपूर्ण शक्तियां पार्टी प्रमुख के आसपास केंद्रित हो गईं।
1997 में चुनाव आयोग ने उठाया था आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट में कौल ने चुनाव आयोग के 1997 के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि उस समय मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र और नियमित संगठनात्मक चुनावों पर जोर दिया गया था।
उनके अनुसार, उस समय 43 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों में से 42 ने संगठनात्मक चुनाव कराए थे, जबकि शिवसेना में पदाधिकारियों की नियुक्ति की व्यवस्था थी। चुनाव आयोग ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता बताई थी।
चुनाव आयोग की आपत्ति के बाद शिवसेना ने कराए संगठनात्मक चुनाव
कौल ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की आपत्तियों के बाद दिसंबर 1997 में शिवसेना ने संगठनात्मक चुनाव कराए। इस प्रक्रिया में पांच वर्ष के लिए 14 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चुनाव किया गया। साथ ही पार्टी के संविधान में संशोधन और आंतरिक चुनावों के नियम तैयार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया।
इसके बाद 1999 में पार्टी के संविधान में बदलाव किए गए और संगठनात्मक पदों तथा निर्वाचित संस्थाओं को अधिक औपचारिक स्वरूप दिया गया।
2018 के संशोधन को लेकर कौल का सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने 2018 में किए गए संविधान संशोधनों को भी अपनी दलीलों का प्रमुख आधार बनाया। उन्होंने कहा कि इन बदलावों से पहले मौजूद संगठनात्मक ढांचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ और पार्टी प्रमुख के पास कई अहम अधिकार केंद्रित हो गए।
कौल ने अदालत के समक्ष सवाल उठाया कि किसी राजनीतिक दल के संविधान में संशोधन करना अपने आप में असामान्य नहीं है, लेकिन क्या ऐसे बदलाव किए जा सकते हैं जिनसे संगठन की अधिकांश शक्तियां एक व्यक्ति के पास केंद्रित हो जाएं और बाद में उसी संविधान को पार्टी की वैधता का आधार बनाया जाए?
उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग ने भी 2018 के संगठनात्मक ढांचे को पार्टी प्रमुख के आसपास केंद्रित ‘पावर सेंटर’ के रूप में देखा था।
‘लोकतंत्र केवल संविधान में लिखे शब्दों से साबित नहीं होता’
कौल की दलील का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजनीतिक दलों में वास्तविक आंतरिक लोकतंत्र से जुड़ा रहा। उन्होंने कहा कि किसी पार्टी के संविधान में लोकतांत्रिक शब्दों का उल्लेख मात्र पर्याप्त नहीं है। संगठन में अधिकारों का बंटवारा, पदाधिकारियों के चुनाव और निर्वाचित संस्थाओं की स्वतंत्र भूमिका भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा होनी चाहिए।
उनके अनुसार, राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं। यही दल उम्मीदवारों का चयन करते हैं, सरकार बनाने में भूमिका निभाते हैं और जनप्रतिनिधियों को तैयार करते हैं। ऐसे में पार्टियों के भीतर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का होना महत्वपूर्ण है।
‘चुनाव आयोग का फैसला अचानक नहीं था’
कौल ने यह तर्क भी रखा कि शिवसेना के संगठनात्मक लोकतंत्र से जुड़ा चुनाव आयोग का रुख अचानक नहीं बना। उनके अनुसार, यह मुद्दा 1997 से आयोग के रिकॉर्ड में मौजूद था और इस संबंध में पार्टी के प्रतिनिधियों से संवाद, नोटिस और सुनवाई जैसी प्रक्रियाएं हुई थीं।
इसलिए, कौल के मुताबिक, मौजूदा विवाद को केवल 2022 के राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
विवाद केवल ‘धनुष-बाण’ तक सीमित नहीं
सुप्रीम कोर्ट में रखी गई दलीलों के अनुसार, मौजूदा विवाद का दायरा केवल चुनाव चिन्ह के आवंटन तक सीमित नहीं है। इसमें पार्टी की पहचान, संविधान, संगठनात्मक ढांचा और पार्टी के भीतर विभिन्न पदों एवं संस्थाओं की भूमिका जैसे मुद्दे भी जुड़े हैं।
कौल ने दलील दी कि यदि किसी राजनीतिक दल के संविधान में निर्वाचित संस्थाओं की भूमिका को इस तरह सीमित कर दिया जाए कि वास्तविक निर्णय शक्ति एक व्यक्ति पर निर्भर हो, तो केवल संस्थाओं के अस्तित्व से आंतरिक लोकतंत्र साबित नहीं किया जा सकता।
मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को प्रस्तावित है। प्रेस नोट के अनुसार, आगामी सुनवाई में शिवसेना की ओर से आगे की दलीलें रखी जाएंगी।
नोट: यह समाचार शिवसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में रखी गई दलीलों पर आधारित है। 2018 के संविधान संशोधन से शक्तियों के एक व्यक्ति के पास केंद्रित होने सहित संबंधित बातें कौल की दलीलों और दावों के रूप में प्रस्तुत की गई हैं।
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