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मोहम्मद मुकीम शेख | मुंबई

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को वाराणसी में आयोजित ‘संस्कृति संसद 2026’ में ‘सनातन मार्तंड’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा की ओर से आयोजित समारोह में उन्हें ‘धर्मध्वजाधारक’ की उपाधि भी प्रदान की गई। इस अवसर पर शिंदे ने सनातन धर्म, संत समाज, भारतीय संस्कृति और धर्मरक्षा के लिए अपने शरीर में रक्त की आखिरी बूंद रहने तक समर्पित रहने का संकल्प व्यक्त किया।

शिंदे ने कहा कि सत्ता से बड़ा सिद्धांत और सत्य होता है, जबकि अधिकार से श्रेष्ठ धर्म और कर्तव्य है। संत समाज और धार्मिक संस्थाओं की ओर से मिला यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की लाडली बहनों, भाइयों, किसानों, वारकरी संप्रदाय और युवाओं का सम्मान है। उन्होंने कहा कि संत समाज द्वारा दिया गया यह सम्मान सनातन धर्म के संवर्धन की जिम्मेदारी को और मजबूत करता है।

वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में 3 से 5 नवंबर 2026 तक आयोजित तीन दिवसीय ‘संस्कृति संसद 2026’ में देशभर से हजारों संत-महात्मा, धर्माचार्य, विचारक और युवा शामिल हुए। कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए शिंदे ने पुरस्कार स्वीकार किया और उपस्थित साधु-संतों पर पुष्पवर्षा कर उनका अभिवादन किया।

काशी और महाराष्ट्र का संबंध सदियों पुराना

अपने संबोधन में शिंदे ने काशी और महाराष्ट्र के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि काशी भारत की आत्मा है और महाराष्ट्र की संत परंपरा ने देश की सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया है। संत ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी के माध्यम से और संत नामदेव ने पंजाब तक भागवत धर्म की पताका पहुंचाकर राष्ट्रीय एकात्मता का संदेश दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के लिए काशी के गागाभट्ट महाराष्ट्र आए थे। वहीं, छत्रपति संभाजी महाराज ने अमानवीय अत्याचार सहने के बावजूद धर्मांतरण स्वीकार नहीं किया और धर्मरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

सिद्धांतों के लिए सत्ता से भी समझौता नहीं

हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे के 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' विचार का उल्लेख करते हुए शिंदे ने पालघर में साधुओं की हत्या की घटना के बाद धर्मरक्षा के लिए सत्ता छोड़ने का निर्णय लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए भी और वर्तमान में उपमुख्यमंत्री के रूप में भी वे स्वयं को एक कार्यकर्ता ही मानते हैं।

उन्होंने महाराष्ट्र में गोमाता को राज्यमाता का दर्जा देने, व्यक्ति के नाम के साथ माता का नाम जोड़ने और लाडली बहना योजना के माध्यम से महिला सशक्तीकरण के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख किया। साथ ही गोसंवर्धन को किसानों की आय, जैविक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ते हुए गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प व्यक्त किया।

शिंदे ने छत्रपति संभाजीनगर, अहिल्यानगर और धाराशिव के नामकरण परिवर्तन तथा प्रतापगढ़ और विशालगढ़ की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के लिए किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया।

धार्मिक स्थलों के विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण जरूरी

अपने संबोधन में उन्होंने अयोध्या के श्रीराम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम, उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर, चारधाम, सोमनाथ, द्वारका और रामेश्वरम के विकास का उल्लेख किया। उन्होंने योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता और नमामि गंगे अभियान को सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सराहना की।

शिंदे ने कहा कि नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले को भव्य, दिव्य, सुरक्षित और स्वच्छ बनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि मंदिरों के साथ अस्पताल, तीर्थस्थलों के साथ आधुनिक विद्यालय और विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी आवश्यक है। राजमाता जीजाऊ, अहिल्यादेवी होलकर और रानी लक्ष्मीबाई के इतिहास के साथ योग, संस्कृत, भगवद्गीता और नैतिक मूल्यों के संस्कार नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान भी उन्होंने किया।

संत समाज और युवाओं की एकजुटता का आह्वान

शिंदे ने सनातन धर्म और लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ अविश्वास एवं अराजकता पैदा करने वाली शक्तियों के विरुद्ध वैचारिक एकजुटता की आवश्यकता बताई। उन्होंने संतों के आशीर्वाद, युवाओं की शक्ति और शासन के सेवाभाव से भारत को वैश्विक महाशक्ति बनाने का संकल्प व्यक्त किया।

'ना झुकेगा स्वाभिमान, ना बदलेगा विचार' के उद्घोष के साथ उन्होंने 'हर हर महादेव' और 'जय श्रीराम' के जयघोष में अपना संबोधन समाप्त किया।

देशभर के संत-महात्मा और धर्माचार्य रहे उपस्थित

इस समारोह में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरीजी, अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष जगद्गुरु अविचल देवाचार्य महाराज, अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती महाराज तथा कोषाध्यक्ष महामंडलेश्वर जनार्दन हरिजी महाराज प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

इसके अलावा धर्मपुरम अधीनम के 27वें पीठाधिपति कैलाश्री, जगद्गुरु रामानंदाचार्य रामकमलाचार्य महाराज, राजेंद्र दासजी, मनमोहन दासजी, राधे राधे महाराज, आचार्य रामकृष्णदासजी, माधवजी महाराज राठी, शिवरूपानंद स्वामीजी, शिवाचार्य महाराज तथा काशी विद्वत परिषद के प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी और रामचंद्रन पांडे सहित देशभर के अनेक संत-महात्मा एवं विद्वान उपस्थित थे।

संस्कृति संसद आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवधर, शिवसेना आध्यात्मिक धर्मवीर सेना के महाराष्ट्र प्रदेशाध्यक्ष आर. अक्षय महाराज भोसले, गंगा महासभा के अध्यक्ष सत्येंद्र मिश्र और महामंत्री गोविंद शर्मा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति भी समारोह में शामिल हुए।

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