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मेंड़ारा शरीफ में रूहानी समां, परचम कुशाई के साथ उर्स-ए-करीमी का भव्य आग़ाज़

हिन्दुस्तान की आवाज के लिए
मेंड़ारा शरीफ से मोहम्मद मुकीम शेख की खास रिपोर्ट

लालगोपालगंज।
क्षेत्र के मेंड़ारा स्थित ऐतिहासिक खानकाह आलिया शाहिया जलालिया में आयोजित तीन दिवसीय सालाना उर्स-ए-करीमी के दूसरे दिन रूहानियत, अकीदत और सूफियाना कैफ़ियत का ऐसा मनमोहक मंज़र देखने को मिला, जिसने हर आने वाले को मसहूर कर दिया। परचम कुशाई के मौके पर हजारों की तादाद में मुरीदों और जायरीन की मौजूदगी ने इस मुक़द्दस महफ़िल को और भी अज़ीम बना दिया।
उर्स के दूसरे दिन की शुरुआत बेहद अदब और एहतराम के साथ परचम कुशाई से हुई। इस मुक़द्दस रस्म की सदारत सरपरस्त पीर-ए-तरीकत सैयद शाह मंसूर मियां बुखारी ने की। इस दौरान हजरत सैयद शाह अब्दुल करीम बुखारी चिश्ती की मजार शरीफ पर ग़ुस्ल और संदल पेश किया गया। जैसे ही परचम लहराया गया, पूरा खानकाह परिसर “या अल्लाह, या रसूल” की सदाओं से गूंज उठा और फिज़ा नूरानी हो गई।

इसके बाद आयोजित मीलाद की रूहपरवर महफ़िल में नातख्वानों ने नात और मनकबत पेश कर माहौल को सरशार कर दिया। हर कलाम में मोहब्बत-ए-इलाही और अदब-ए-औलिया की झलक साफ नज़र आई। इस मौके पर मौलाना सैयद रागिब मियां बुखारी अज़हरी ने अपने असरदार खिताब में कहा कि
“खानकाहें सिर्फ इबादत की जगह नहीं होतीं, बल्कि ये इंसानियत, अमन, अख़ुव्वत और मोहब्बत का पैगाम देने वाले मरकज़ होती हैं। यहां से निकलने वाली रूहानी खुशबू समाज को जोड़ने का काम करती है।”

कार्यक्रम का संचालन शाबान बर्काती ने बेहतरीन अंदाज़ में किया। वहीं, महफ़िल-ए-शमा में कोलकाता से तशरीफ़ लाए प्रसिद्ध हाफिज़ कौवाल ने हजरत की शान में सूफियाना मनकबत पेश की। उनके दिलनशीं और असरदार कलाम ने मुरीदों और हजारों जायरीन को इस क़दर मसहूर कर दिया कि हर आंख नम और हर दिल झूम उठा। महफ़िल देर रात तक रूहानी कैफ़ियत में डूबी रही।

इस मुक़द्दस महफ़िल की अध्यक्षता वली अहद सैयद जावेद बुखारी ने की। उर्स में मौलाना आरिफ अज़हरी, सैयद अहमद बुखारी, रजा हुसैन, मौलाना राफे बहराइची, शहजाद हुसैन, मोहम्मद फैसल, हाशिम, मुबीन अहमद फारूकी सहित बड़ी संख्या में उलेमा, मशाइख और अकीदतमंद मौजूद रहे।

उर्स के दौरान जायरीन के लिए खानकाह की ओर से बेहतर इंतजाम किए गए थे। दूर-दराज़ से आए अकीदतमंदों ने दुआओं के साथ अपनी मन्नतें पेश कीं और अमन, सलामती व खुशहाली की दुआ मांगी।

मेंड़ारा शरीफ का यह सालाना उर्स एक बार फिर इस बात का गवाह बना कि सूफियाना दरगाहें आज भी लोगों को जोड़ने, मोहब्बत सिखाने और इंसानियत की राह दिखाने का काम कर रही हैं।

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