भिवंडी,हिन्दुस्तान की आवाज,एम हुसेन
भिवंडी। ।15 अगस्त के अवसर पर देश के मदरसा इस्लामिया में बडे उत्साह के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। मुसलमान स्वतंत्रता दिवस क्यों न मनाएं, यही वह दिन है जिसे देखने के लिए सात लाख मुसलमानों ने और अस्सी हजार उलमाओं ने अपने प्राणों की बली दी है । अंग्रेज शासन से पहले देश में मुगल बादशाओं की सरकार थी, मुगल शासन के समय ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के बहाने देश में आई और अपनी गुप्त योजनाओं के आधार पर देश पर कब्जा जमाकर शासक बन गए। अंग्रेजों की सत्ता से जितनी असुविधा देश में बसने वाली अन्य जातियों को थी उससे अधिक मुसलमानों को थी इसलिए कि ग़रीब नवाज़ के दौर से बहादुर शाह जफर तक मुसलमानों का एक महान युग समाप्त हुआ था और सितम पर सितम यह कि पैरों में गुलामी की जंजीरें पड गई थीं, इसलिए जब गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की बारी आई तो सबसे पहले अल्लामा फजले हक खैराबादी जैसे महान नेता ने अंग्रेज़ों के खिलाफ जिहाद का फतवा दिया और फिर कुर्बानियों का एक सिलसिला सन 1857 से शुरू होकर स्वतंत्रता दिवस तक जारी रहा। लेकिन अफसोस कि आज, हमारे ही देश में वफादारी पर प्रश्नचिह्न लगाएजाने की कोशिश की जारही है। उक्त प्रकार की प्रतिक्रिया मौलाना मुहम्मद यूसुफ रजा कादरी ने सुन्नी जामा मस्जिद कोटर गेट में शुक्रवार को संबोधित करते हुए किया। मौलाना ने यह भी कहा कि इन दिनों वंदे मातरम और राष्ट्रीय गीत को लेकर मुसलमानों पर आपत्ति जताई जा रही है कि मुसलमान नहीं कहते और गाते इसलिए मुसलमान देश के वफादार नहीं हैं.इस पर मुसलमानों द्वारा बार-बार कहा गया कि हम देश के वफादार थे, हैं और रहेंगे । देश के प्रति वफादारी न करने का कोई कारण ही नहीं है। परंतु ऐसी पंक्तियां जो इस्लाम के खिलाफ हैं वह गाने पर हमें मजबूर किया जाता है और मना करने पर देश के गद्दार होने का आरोप लगाया जाता है और फिर वंदे मातरम को तो वैध भी नहीं माना गया है । मौलाना ने केंद्र सरकार से मांग की है कि सरकार सभी धर्मों के धर्मगुरू को आमंत्रित करें और सभी की उपस्थिति में एक घरेलू गान और नारे तैयार करें । जब किसी गान और नारे पर सबकी सहमति हो जाएगा तो हमेशा के लिए यह अनावश्यक विवाद समाप्त हो जाएगा। फिर असहमति का अंतर भी समाप्त हो जाएगा।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- Disclaimer हमे आप के इस न्यूज़ पोर्टल को बेहतर बनाने में सहायता करे और किसी खबर या अंश मे कोई गलती हो या सूचना / तथ्य मे कमी हो अथवा कोई कॉपीराइट आपत्ति हो तो वह ईमेल hindustankiaawaz.in@gmail.com भेज कर सूचित करे । साथ ही साथ पूरी जानकारी तथ्य के साथ दे । जिससे आलेख को सही किया जा सके या हटाया जा सके ।
भिवंडी। ।15 अगस्त के अवसर पर देश के मदरसा इस्लामिया में बडे उत्साह के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। मुसलमान स्वतंत्रता दिवस क्यों न मनाएं, यही वह दिन है जिसे देखने के लिए सात लाख मुसलमानों ने और अस्सी हजार उलमाओं ने अपने प्राणों की बली दी है । अंग्रेज शासन से पहले देश में मुगल बादशाओं की सरकार थी, मुगल शासन के समय ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के बहाने देश में आई और अपनी गुप्त योजनाओं के आधार पर देश पर कब्जा जमाकर शासक बन गए। अंग्रेजों की सत्ता से जितनी असुविधा देश में बसने वाली अन्य जातियों को थी उससे अधिक मुसलमानों को थी इसलिए कि ग़रीब नवाज़ के दौर से बहादुर शाह जफर तक मुसलमानों का एक महान युग समाप्त हुआ था और सितम पर सितम यह कि पैरों में गुलामी की जंजीरें पड गई थीं, इसलिए जब गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की बारी आई तो सबसे पहले अल्लामा फजले हक खैराबादी जैसे महान नेता ने अंग्रेज़ों के खिलाफ जिहाद का फतवा दिया और फिर कुर्बानियों का एक सिलसिला सन 1857 से शुरू होकर स्वतंत्रता दिवस तक जारी रहा। लेकिन अफसोस कि आज, हमारे ही देश में वफादारी पर प्रश्नचिह्न लगाएजाने की कोशिश की जारही है। उक्त प्रकार की प्रतिक्रिया मौलाना मुहम्मद यूसुफ रजा कादरी ने सुन्नी जामा मस्जिद कोटर गेट में शुक्रवार को संबोधित करते हुए किया। मौलाना ने यह भी कहा कि इन दिनों वंदे मातरम और राष्ट्रीय गीत को लेकर मुसलमानों पर आपत्ति जताई जा रही है कि मुसलमान नहीं कहते और गाते इसलिए मुसलमान देश के वफादार नहीं हैं.इस पर मुसलमानों द्वारा बार-बार कहा गया कि हम देश के वफादार थे, हैं और रहेंगे । देश के प्रति वफादारी न करने का कोई कारण ही नहीं है। परंतु ऐसी पंक्तियां जो इस्लाम के खिलाफ हैं वह गाने पर हमें मजबूर किया जाता है और मना करने पर देश के गद्दार होने का आरोप लगाया जाता है और फिर वंदे मातरम को तो वैध भी नहीं माना गया है । मौलाना ने केंद्र सरकार से मांग की है कि सरकार सभी धर्मों के धर्मगुरू को आमंत्रित करें और सभी की उपस्थिति में एक घरेलू गान और नारे तैयार करें । जब किसी गान और नारे पर सबकी सहमति हो जाएगा तो हमेशा के लिए यह अनावश्यक विवाद समाप्त हो जाएगा। फिर असहमति का अंतर भी समाप्त हो जाएगा।
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