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बदौसा, बांदा (संतोष खुशवाहा) विश्व विजेता चक्रवर्ती देवानांप्रिय सम्राट अशोक मौर्य महान की 2321 वीं जयंती 04 अप्रैल 2017 अशोकाष्ठमी के रूप में पूरीश्रद्धा के बीच समता-स्वतंत्रता-बन्धुता और न्याय की स्थापना के संकल्प के साथ मनाई गयी।

तरुण विकास संस्थान बदौसा में अशोकाष्ठमी के अवशर पर विश्व विजेता चक्रवर्ती देवानांप्रिय सम्राट अशोक मौर्य महान की 2321 वीं जयंती 04 अप्रैल 2017 मनाई गयी। चक्रवर्ती सम्राट अशोक का जन्म नेपाल में माया देवी मंदिर के पास लुम्बनी में हुआ था। सम्राट अशोक महान मौर्य वंश के सम्राट बिन्दुसार और रानी धर्मा के पुत्र थे। कलिंग युद्ध में एक लाख लोगों की हत्या के उपरान्त सम्राट अशोक महान के हृदय में महान परिवर्तन हुआ। उनका हृदय मानवता और करुण से उद्दोलित हो गया। युद्ध से बुद्ध का रास्ता अख्तियार कर आध्यत्मिक और धम्य विजय का युग प्रारम्भ कर उन्होंने महान बौद्ध धर्म को अपनाया। पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को धम्य प्रचार में लगाया था। बुद्ध की श्विबन्धुता की शिक्षा सदियों तक भारत के आसपास के देशों में मैत्री सौम्सय की कड़ियों के बंधन में बंधी थी।

उमा कुशवाहा निदेशक तरुण विकास संस्थान नें कहा कि महान सम्राट अशोक के कार्यकाल के दौरान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के शरीर ”अवशेष धातुओं“ को 84,000 भागों विभाजित कर के 84 हजार स्तुपों का निर्माण कराया। सम्राट अशोक महान विश्व के इतिहास में मानव कल्याणकारी मौर्य राजा थे, इनके शासन में बुद्ध के नैतिक मूल्यों के आधार जापान से मिश्र तक, बाली से ले कर यूनान तक समता-स्वतंत्रता-बन्धुता और न्याय का सुर्वण युग का विकास भवन खड़ किया था। सम्राट अशोक महान का शासन 40 सालों तक रहा।

सौरभ पाल नें कहा कि नोवल पुरूस्कार विजेता अर्थशास्त्री डाॅ0 अमत्र्य सेन के अनुसार सम्राट अशोक के काल में दुनिया की अर्थब्यवस्था में भारत की 35 प्रतिशत भागीदारी थी। महान सम्राट अशोक के समय बौद्ध कालखंड के अखण्ड भारत का बजट 36 करोड़ का था। बौद्धकालीन अखण्ड भारत में बुद्ध के नैतिक मूल्यों के आधार पर जाति विहीन शील सम्पन्न गुणों से उच्च आदर्श विचारों को समाजिक विकास दुनिया के दो रुपया तो भारत का एक रुपया हिस्सा था। सामाजिक-आर्थिक विषमता न के बराबर थी।

सन्तोष कुशवाहा प्रियदशी यूथ फाउण्डेशन नें कहा कि बुद्ध की सामाजिक आर्थिक नीति सामूहिक जीवनचर्या 84000 स्तुपों और संघरामों से बौद्ध नैतिकमूल्यों के साथ अन्य विषयों की निःशुल्क दी जानें वाली शिक्षा, खेतिका और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रीयकरण था। बुद्ध की शिक्षा वास्तविक मानव और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है और इसकी प्रारम्भिक प्रेरणा बुद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों से ही मिली है। महान सम्राट अशोक का विशाल साम्राज्य जनकल्याणकार्यों की दिघदर्शक की गूंज जापन से मिश्र तक बाली से ले कर यूनान तक गौरवान्वित थी।

अर्जुन सिंह नें कहा महान सम्राट अशोक के चैमुख प्राचीन सुवर्णयुग के अखण्ड़ भारत के विकास का आधार बुद्ध के नैतिक मूल्यों की शिक्षा के आधुनिक भारत के प्रतीक चार चक्र, स्वतंत्रत भारत के लोकतंत्र के अखण्ड़ता के चिरस्थाई के लिए देश के जनमानस को बुद्धत्तरभारत के चैमुख नैतिकमूल्यों के विकासात्मक कार्यों के संस्करण की प्रेरक गाथा के प्रति बाबा साहेब डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर नें अपनी सन्मान जनक कृतज्ञता प्रकट करते हुए विश्व जगत में भारत के बौद्ध कालीन सुवर्ण युग को गौरवान्वित किया।

इस अवसर पर शैलेन्द्र कुशवाहा, रामनरेश, रामभवन कुशवाहा, रमाशंकर सैनी, रामरूप, अरविन्द कुमार, इन्द्रजीत, कुलदीप कुशवाहा, धर्मेन्द्र सिंह, राजेश कुमार, जगपत सिंह यादव, होरीलाल प्रजापति, आमऔतार प्रजापति, कमलाकांत सहित मौजूद दर्जनों लोगों नंे समता-स्वतंत्रता-बन्धुता और न्याय की स्थापना का संकल्प लिया।

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