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रामपुर। रज़ा लाइब्रेरी के सभागार में दाग़ देहलवी रामपुर और हैदाराबाद“ विषय पर उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद की भूतपूर्व विभागाध्यक्ष, उर्दू विभाग प्रोफेसर फ़ातिमा बेगम ने विस्तार व्याख्यान प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर ईराक़ रज़ा जै़दी, भूतपूर्व विभागाध्यक्ष, फ़ारसी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली ने की।
इस कार्यक्रम का शुभारम्भ डाॅ० मोहम्मद इरशाद नदवी द्वारा तिलावते कुरान एवं सैयद नवेद कैसर की नाते पाक से हुआ।
इस अवसर पर उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद की भूतपूर्व विभागाध्यक्ष, उर्दू विभाग प्रोफेसर फ़ातिमा बेगम ने अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि दाग़ देहलवी के जीवन को तीन हिस्सों में देखा जा सकता है, 25 साल देहली में, 30 साल रामपुर में और 18 साल हैदराबाद में। दाग़ नवाब कल्बे अली खाँ के देहान्त के बाद दिल्ली वापस चले गये और वहाँ से हैदराबाद चले गये। हैदराबाद में 1 साल 7 महीने तक निज़ाम के समक्ष शायरी पेश करने पर भी उन्हें कोई स्थायी पद प्राप्त नहीं हुआ। अतः धन की कमी के कारण पुनः दिल्ली आ गये। कुछ माह गुजरने के बाद उनको निज़ाम का पत्र प्राप्त हुआ तथा दोबारा हैदराबाद पहुँचने पर उन्हें 450/- रूपये प्रतिमाह की तनख्वाह पर रख लिया गया। प्रो० साहिबा ने दाग़ देहलवी के जीवन की एक घटना प्रस्तुत करते हुए बताया कि एक बार निज़ाम ने उनसे पूछा कि आपका सबसे अच्छा शार्गिद कौन है ? तब दाग़ ने कहा कि मेरे सबसे अच्छे शार्गिद आप हैं। दाग़ शीलवान, विनम्र, विनोदी तथा स्पष्टवादी थे और सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करते थे। दाग़ ने एक तबके के लिए ही अपनी शायरी को नहीं रखा बल्कि सारे हिन्दुस्तान को ध्यान में रखकर अपनी शायरी लिखी, जो हर शख्स की समझ में आती है। कहा कि दाग़ जिन छोटी रियासतों में रहे वहाँ की ज़बानों को उन्होंने अपनी ज़बान में मिला लिया। दाग़ ने हिन्दुस्तानी ज़बान को मेहनत से आगे बढ़ाया। उन्होंने आगे कहा कि दाग़ को ऐसी जिन्दगी इसलिए मिली क्यांेकि इन्होंने किसी से दुश्मनी व नाराजग़ी नहीं रखी। अपने दुश्मनों को अपना दोस्त बनाया। उन्हें हालातों को मोड़ना और झुकाना आता था और अपनी खूबियों को पहचान कर और कमियों को मिटाकर जिन्दगी में वे आगे बढ़ते गये। दाग़ ने अपनी शायरी के माध्यम से पूरी इन्सानियत को सामने रखा, जिन्दगी के हर पहलू को सामने रखा। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि आज में जी लो, अगर आज में जिओगे तो कल खुद संवर जायेगा।
इस अवसर पर प्रो० सैयद हसन अब्बास निदेशक रामपुर रज़ा लाइब्रेरी ने कहा कि दाग देहलवी दिल्ली से रामपुर आये और रामपुर से हैदराबाद गये। गत वर्ष अप्रैल माह में ही इस विषय पर प्रो० अली अहमद फ़ातमी साहब, उर्दू विभागाध्यक्ष, इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद का व्याख्यान हो चुका है और उसी व्याख्यान की आगे की कड़ी आज आयोजित की जा रही है। उन्होंने कहा कि दाग़ ने रामपुर के हवाले से जो शेर कहे हैं वे सब आज तक पढ़े जा रहे हैं और लोगों को याद भी हैं। मैं यहाँ दाग़ देहलवी का यह शेर पढ़ता हूँ-
है अज़ब शहर मुस्तफ़ाआबाद
रखना अल्लाह इसको तू आबाद
लोग इसे रामपुर कहते हैं
हम तो इसे आरामपुर कहते हैं।
प्रो० अब्बास साहब ने आगे कहा कि दाग 1831 ई० मंे दिल्ली में पैदा हुये, 1866 में रामपुर आये और 1888 में रामपुर से हैदराबाद चले गये। वहाँ निजाम के उस्ताद की हैसियत से बड़ी शानो शौकत से जीवन यापन किया और 1905 में हैदराबाद दक्खन में ही उनका स्वर्गवास हो गया। दाग़ देहलवी का सम्बन्ध जो इस शहर से है वह आप सबको मालूम है। प्रो० फ़ातिमा बेगम का परिचय देते हुए प्रो० हसन अब्बास साहब ने कहा कि प्रो० साहिबा का सम्बन्ध भी हैदराबाद से है। आपने उस्मानिया विश्वविद्यालय से पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त करने के बाद वहीं से नौकरी का शुभारम्भ किया। आपने एम० ए० उर्दू में प्रथम स्थान व दो गोल्ड मेडल प्राप्त किये। 14 वर्ष सरकारी काॅलेज में और 24 वर्ष उस्मानिया विश्वविद्यालय में उर्दू प्रोफेसर के रुप में कार्य किया। जनवरी 2014 में 38 साल की नौकरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुईं।
इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर ईराक़ रज़ा जै़दी, भूतपूर्व विभागाध्यक्ष, फ़ारसी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली ने कहा कि जब शाहजहाँ ने अपना लकब ‘शाहजहाँ’ रखा तो सारे लोग परेशान हो गये कि यह कैसे हो सकता है। लेकिन शाहजहाँ ने कहा कि हमारा हिन्दुस्तान ही हमारा जहान है। इसी तरीके से दाग़ ने भी अपनी मिली जुली ज़बान को हिन्दुस्तानी कहा। पटियाला में उर्दू ज़बान को बढ़ावा देने में दाग़ का ही योगदान है और उनकी वजह से वहाँ भी शायर हैं।
इस कार्यक्रम का संचालन डाॅ० अबुसाद इस्लाही ने किया और कार्यक्रम के अन्त में सभी धन्यवाद दिया।
इस अवसर पर डाॅ० किश्वर सुल्ताना, श्री एस० फज़ीलत, डाॅ० प्रदीप जैन (मुजफ्फरनगर), श्री मुस्तफा ज़ैदी, डाॅ० अब्दुल रऊफ, श्री जावेद अली खाँ, श्री मुमताज़ अर्शी, श्री मुस्तफ़ा आबदी, श्री जावेद नसीमी, श्री शरीफ नसीमी, श्री रमेश जैन, श्री सिफ़त अली खाँ, नासिर उद्दीन एडवोकेट इत्यादि शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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