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एम्स में जटिल सर्जरी की सभी सुविधाएं उपलब्ध  : निदेशक
- कहा, बच्चों की सर्जरी दूरबीन विधि व रोबोट द्वारा की जाती है

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के चिकित्सकों ने हिर्चस्प्रंग बीमारी से ग्रस्त एक छह दिन के नवजात की बिना चीरे की सफलतापूर्वक सर्जरी की है, नवजात को जन्म से जातिविष्ठा या मल नहीं निकलने की समस्या थी। संस्थान के निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत ने नवजात की बिना चीरा लगाए जटिल सर्जरी करने वाली चिकित्सकीय टीम की इस सफलता को सराहा और इसके लिए उन्हें बधाई दी। एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने बताया कि पीडियाट्रिक सर्जरी सहित विभिन्न तरह की सर्जरी वाले विभागों के चिकित्सकों को संस्थान की ओर से इस तरह की जटिलतम सर्जरी के लिए प्रोत्साहित करने के साथ ही हरसंभव सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं,जिससे रोगियों को संस्थान में मुकम्मल उपचार का लाभ मिल सके। निदेशक पद्मश्री प्रो. रवि कांत ने बताया कि पीडियाट्रिक विभाग में इस तरह की जन्मजात बीमारियों की जटिल सर्जरी को करने के लिए सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो कि उत्तराखंड ही नहीं समीपवर्ती राज्यों के लोगों के लिए भी एक वरदान है। निदेशक प्रो. रवि कांत ने बताया कि विभाग में बच्चों की सर्जरी दूरबीन विधि व रोबोट द्वारा की जाती है, साथ ही इसके लिए विभाग को आईसीयू-वेंटीलेटर कृत्रिम सांस की मशीन आदि सभी जरुरी संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं।  उन्होंने बताया कि  एम्स अस्पताल में बाल सर्जरी विभाग में छह दिन के नवजात मास्टर अर्श को जन्म से ही मेकोनियम जातविष्ठा या मल के नहीं निकलने की समस्या थी। जिससे बच्चे को उल्टी व पेट फूलने की समस्या थी। लोअर जीआई कांट्रास्ट स्टडी ( बेरियम इनमा) से बच्चे के हिर्चस्प्रंग बीमारी से पीड़ित होने के लक्षणों का पता चला। निदेशक एम्स प्रो. रवि कांत ने बताया कि सामान्यतौर पर इस बीमारी में पीड़ित का इलाज तीन चरणों में किया जाता है, जिसमें पहली सर्जरी कोलोस्टोमी मल निकलने के लिए पेट में रास्ता बनाया जाता है और दूसरे चरण में रोगग्रस्त आंत्र खंड का आकार बदला जाता है और सामान्य आंत्र खंड को गुदा नलिका में नीचे उतारा जाता है, जबकि अंतिम चरण में कोलोस्टोमी बंद की जाती है। इस बीमारी में मरीज को कम से कम 18 महीने लगातार फॉलोअप में अस्पताल  आना पड़ता है। जिससे मरीज के इलाज में होने वाला खर्च भी अत्यधिक बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि संस्थान में की गई इस सर्जरी को पीजीआई चंडीगढ़ के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रो. राम समुझ की अगुवाई में एम्स ऋषिकेश के डा. इंतजार अहमद व डा. इनेने युश के सहयोग से अंजाम दिया गया। निदेशक पद्मश्री प्रो. रवि कांत ने बताया कि  यह सर्जरी एकल चरणीय बिना चीरे वाली सर्जरी ट्रांसएनल एंडो -रेकटल पुल कहलाती है। जिसमें पीड़ित बच्चे को जनरल एनेस्थीसिया दिया गया और रोगग्रस्त आंत्र खंड को गुदा द्वार के जरिए हटा दिया गया। इसके लिए बच्चे के पेट पर किसी भी तरह का चीरा नहीं लगाया गया,कोई कोलोस्टोमी नहीं की जाती। बच्चा सामान्यतौर पर दूध पी रहा है और दो से तीन बार मल त्याग कर रहा है। बताया कि एहतियातन अस्पताल में तीन दिन दाखिले के बाद बच्चे को डिस्चार्ज कर दिया गया है। एम्स के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के डा. इंतजार अहमद ने बताया कि हिर्चस्प्रंग बीमारी एक जन्मजात विसंगति है,जिसमें नवजात या तो मल त्याग नहीं करता है या मल त्याग में बहुत समय लगता है। यह बीमारी आंत्र में नाइग्रंथि कोशिकाओं के पलायन के फेल होने से होती है। इस बीमारी का फैलाव अलग- अलग उम्र के बच्चों में भी होता है। चिकित्सक के अनुसार यह  बीमारी नवजात बच्चों में आपात ​स्थिति भी पैदा कर सकती है या थोड़ी उम्र में शिशुओं में गंभीर मलावरोध कब्ज जैसी हो सकती है।

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