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हिन्दुस्तान की आवाज, हेमेन्द्र क्षीरसागर, लेखक व विचारक,

देश की आजादी और नवनिर्माण में सर्वस्त्र न्योछावर करने वाले पुरोधाओं की कमी नहीं है, कोई ज्ञात है तो कोई अज्ञात है। जो स्मृत है उन्हें श्रद्धा के दो फूल नसीब है और विस्मृत को सजदा के दो बोल भी मुनासिब नहीं। शाष्वत सबकी भूमिका अपनी जगह बहुमूल्य है, बात है मानने की तो अनुयायी अपने-अपने तरीके से हमराही को याद करते है, इसमें किसी को कोई गुरेज और प्रतिस्पर्धा नहीं होना चाहिए। पर कुछेक राजनैयिकों को यह रास नहीं आ रहा है और तेरे-मेरे महापुरूष की नुरा-कुष्ति में त्याग, तपष्या और बलिदान को तार-तार करने में जुटे है। ऐसा ही मंजर हालिहि में राजनैतिक दाना-पानी की तडप में परिलक्षित हुआ था।
जब, अंतिम छोर पर खडे रामनाथ कोविंद ने देष का प्रथम नागरिक बनते ही राष्ट्रपति पद की शपथ क्या ली वह विपक्ष के सीधे निषाने पर आ गए। कोविंद ने पहले उद्बोधन में राष्ट्र निर्माण और समाज उत्थान में योगदानी देष के 8 नेताओं का जिक्र किया। जिसमें 6 कांग्रेस, एक जनसंघ तथा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम  था लेकिन पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू-इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का कीर्ति गान नहीं होने पर कांग्रेस ने ऐतराज जताया था। अलावा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ-साथ 25 सितंबर 1916 को जन्मे महामना पं. दीनदयाल उपाध्याय को ख्यातिलब्द्ध करना कतई पंसद नहीं आया। इसे बापू का अपमान मानते हुए कांग्रेस भडक गई और संसद से सडक तक अनचाह भखेडा खडा कर दिया था। कांग्रेस ने दोनों ही सुरते-हाल में महामहिम के प्रेरक प्रसंग को आपत्ति जनक और गैर वाजिब बताया। खासतौर पर राष्ट्रपति का राष्ट्रपिता के समतुल्य पं. दीनदयाल का नामाचार काफी नागवार गुजरा।
नाराजगी के दौर में मुगलसराय रेल्वे स्टेषन का नाम पं. दीनदयाल उपाध्याय होते ही तथाकथित विपक्षियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। मुगलों की याद में पं. दीनदयाल की 11 फरवरी 1968 को इसी मुगलसराय स्टेषन पर रहस्यमय कुर्बानी को एक झटके में झुटला दिया। ये भूल गए तब इनकी आकस्मिक मृत्यु पर देष के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने दुख प्रकट करते हुए कहा था ‘‘सूर्य ढल गया, अब हमें तारों के प्रकाष में मार्ग खोजना होगा।’’                                  
बहरहाल, विडंबना कहें या दुर्भाग्य प्राचीन, अखंड, स्वावलंबी, और संस्कारित भारत के भाग्य विधाताओं को मौकापरस्त, दलगामी स्वयंभू नेता योगदानी का प्रमाण-पत्र देते फिर रहे है! वीभत्स, इतिहास हेतु वामपंथ और शाहदत वास्ते कांग्रेस का मुंह ताकना पडेगा? भूलभूलैया में कि सांच को आंच की जरूरत नहीं है। चलो! इसी बहाने इन महान विभूतियों की याद तो आई। मुख्तसर पं. दीनदयाल की! वस्तुतः राष्ट्रपिता की स्वदेषी से ग्रामोदय और दीनबंधु दीनदयाल के अन्त्योदय से सर्वोदय की परिकल्पना भारतीय जीवन का मूल दर्षन जगजाहिर है।                                      
 स्तुत्य, 1967 में जनसंघ के निर्वाचित अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय जीवनपर्यन्त संघ की सेवा से जुडकर भारत की राजनीति में एक दिषा-निर्देषक उज्जवल प्रकाषपुंज की तरह दीप्तमान रहे। राष्ट्रजीवन दर्षन के निर्माता दीनदयाल का उद्देष्य स्वतंत्रता की पुर्नरचना के प्रयासों के लिए विषुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टि प्रदान करना था। मूल विचारक के रूप में एकात्म मानववाद के सर्वप्रथम प्रतिपादक मानव षिल्पी दीनदयाल ने आधुनिक राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा समाज रचना के लिए एक चतुरंगी भारतीय धरातल प्रस्तुत किया है। निःसंदेह ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में दीनदयाल उपाध्याय का मूलगामी चितंन भारतीयों का उसी पथ पर प्रषस्त करता रहेगा, जिस प्रकार प्राचीनकाल में आचार्य चाणक्य का ‘अर्थषास्त्र’ और आधुनिक काल में लोकमान्य तिलक का ‘गीता रहस्य’ व महात्मा गांधी का ‘ग्राम स्वराज’।
 अभिभूत, एक चिंतक, प्रखर साहित्यकार और श्रेष्ठ पत्रकार के अतिरिक्त सही मायने में मानव षिल्पी भी थे दीनबंधु दीनदयाल। अलौकिक किसी प्रकार का भौतिक माया-मोह उन्हें छू तक नहीं सका। विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के बहुतेरे गुणों के इस स्वामी ने भारत वर्ष में समतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार व प्रोत्साहन करते हुए सिर्फ 52 साल की उम्र में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए। क्यां यह राष्ट्र निर्माण में योगदान कमतर है? जो राजनीतिक विरोध के चलते अकल के अंधों को दिखाई नहीं दिया। आह्लादित, देगा भी कैसे? उनके लिए तो देश की आजादी व उन्नति में असंख्य योद्धा व कर्मवीरों के मुकाबले एक परिवार और पार्टी का योगदान श्रेष्ठ है। यथेष्ट जरूरत है तो नाम, दल, संस्था और विचाराधारा के परे अनगिनत गुमनाम सूत्रधार भी हमारे अंतस में अजर-अमर रहें।                          
                                           

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